Tuesday, 22 September, 2026
ओ रे ओ महावीर, तुझने जोता ए समझाय छे.
अंतर से सुंदर थवाणु छे ...
बालर नू सौंदर्य निरखी, भावो भव रखड्या करूं,
हवे, अंतर थी सुंदर थवाणु छे ...
वैराग्य मा पन, अहं ना, पर्वत प्रभु चांटो रह्यो.
पर्वत चनाता जोईने, शांता अनुभवतो रह्यो,
मिथ्या ताणी ए शांता ने हूँ क्यारे ओढूं प्रभु ...
साची समझ थी मारु जीवन, क्यारे हूँ जीवूं प्रभु -.
महावीर ... (4)
Source: Vatsal Mehta


