या भव-कानन में चतुरानन, पाप-पनानन घेरि हमेरी।
आतम-जानन मानन ठानन, बान न होन द इ सठ मेरी।।
तामद भानन आपहि हो, यह छान न आन न आनन टेरी।
आन गही शरनागत को, अब श्रीपतजी पत राखहु मेरी।।
ॐ हीं श्री शांतिनाथजिनेन्द्र! अन्र अवतरत अवतरत संवौषट्!
(आह्हाननम्)
ॐ ही श्री शांतिनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठ :! (स्थापनम्)
ॐ ह्ीं श्री शांतिनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भवत भवत वषट्!(सन्निधिकरणम्)


हिमगिरि-गत-गंगा, धार अभंगा, प्रासुक संगा भरि भृंगा।
जर-जनम-मृतंगा, नाशि अघंगा, पूजि पदंगा मृदु हिंगा।।
श्री शांति-जिनेश, नुत-शक्रेश, वृष-चक्रेशं चक्रेशं।
हनि अरि-चक्रेशं, हे गुनधेशं, दयाऽमृतेशं मक्रेशं।।
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं
निर्वपामीति स्वाहा ॥
वर बावन-चंदन, कदली नंदन, घन-आनंदन-सहित घसूं।
भवताप-निकंदन, ऐरा-नंदन, वदि अमंदन चरन वसूं।।
श्री शांति-जिनेश, नुत-शक्रेश, वृष-चक्रेश चक्रेशं।
हनि अरि-चक्रेशं, हे गुनधेशं, दयाडमृतेशं मक्रेशं।
ॐ हीं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय भवाताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीतिस्वाहा ॥


हिमकर करि लज्जत, मलय सुसज्जत, अच्छत जज्जत भरि धारी।
दुःख-दारिद गज्जत, सदपद-सज्जत, भव-भय-भज्जत अतिभारी।।
श्री शांति-जिनेश, नुत-शक्रेश, वृष-चक्रेशं चक्रेशं।
हनि अरि-चक्रेश, हे गुनधेश, दयाऽमृतेश मक्रेशें।।
ॐ ह्ी श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति
स्वाहा।।


मंदार सरोजं, कदली जोजं, पुंज भरोजं मलय-भरें।
भरि कंचनथारी, तुम-ढिंग धारी, मदन-विदारी धीरधरं।।
श्री शांति-जिनेश, नुत-शक्रेश, वृष-चक्रेशं चक्रेशं।
हनि अरि-चक्रेशं, हे गुनधेशं, दयाSमृतेशं मक्रेशं।।
ॐ ह्वीं श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।


पकवान नवीने, पावन कीने, षट्ररस भीने सुखदा इ।
मन-मोदन हारे, छुधा विदारे, आगे धारे गुनगा ई।।
श्री शांति-जिनेश, नुत-शक्रेश, वृष-चक्रेश चक्रेश।
हनि अरि-चक्रेशं, हे गुनधेशं, दयाSमृतेशं मक्रेशं।।
ॐ ह्वी श्रीशांतिनाधजिनेन्द्राय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यां निर्वपामीतिस्वाहा ॥


तुम ज्ञान प्रकाशे, भ्रम-तम नाशे, ज्ञेय-विकासे सुख-रासे।
दीपक उजियारा, या तें धारा, मोह-निवारा निज भासे।।
श्री शांति-जिनेश, नुत-शक्रेशं, वृष-चक्रेशं चक्रेशं।
हनि अरि-चक्रेशं, हे गुनधेशं, दयाऽमृतेशं मक्रेशं।।
ॐ हीं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय मोहांधकार-विनाशनाय दीप निर्वपामीतिस्वाहा।।


चंदन करपूर, करि वर-चूर, पावक भूरं माहि जुरें।
तसु धूम उड़ावे, नाचत जावे, अलि गुंजावे मधुर सुरें।।
श्री शांति-जिनेशं, नुत-शक्रेशं, वृष-चक्रेशं चक्रेशं।
हनि अरि-चक्रेशं, हे गुनधेशं, दयाऽमृतेशं मक्रेशं।।
ॐ हीं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
बादाम खजूरं, दाड़िम पूरं, निंबुक भूरं ले आयो।
ता सों पद जज्जूं, शिवफल सज्जूं, निजरस रज्जन उमगायो।।
श्री शांति-जिनेशं, नुत-शक्रेशं, वृष-चक्रेशं चक्रेशं।
हनि अरि-चक्रेश, हे गुनधेश, दयाऽमृतेशं मक्रेशें।।
ॐ हीं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफल-प्राप्तये फरल निर्वपामीति स्वाहा।।
वसु-द्रव्य सँवारी, तुम-ढिंग धारी, आनंदकारी, दृग-प्यारी।
तुम हो भवतारी, करुना-धारी, या ते थारी शरना री।।
श्री शांति-जिनेश, नुत-शक्रेश, वृष-चक्रेश चक्रेशं।
हनि अरि-चक्रेशं, हे गुनधेशं, दयाSमृतेशं मक्रेशं।।
ॐ ह्ीं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय अनर्ध्यपद-प्राप्तये अध्य निर्वपामीति स्वाहाII

पंचकल्याणक-अध्यावली

(छन्द)

असित-सातयँ-भादव जानिये, गरभ-मंगल ता-दिन मानिये।
सचि कियो जननी-पद-चर्चनें, हम करें इत ये पद-अर्चनें।।
ॐ हीं भाद्रपदकृष्ण-सप्तम्यां गर्भमंगल-मंडिताय श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय
अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा ।1।
जनम जेठ-चतुर्दशि-श्याम है, सकल-इन्द्र सु आगत धाम है।
गजपुरै गज-साजि सबै तबै, गिरि जजे इत मैं जजिहूँ अबै।।
ॐ ह्वीं ज्येष्ठकृष्ण-चतुर्दश्यां जन्ममंगल-मंडिताय श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय
अध्य निर्वपामीति स्वाहा ।2।


भव-शरीर-सुभोग असार हैं, इमि विचार तबै तप धार हैं।
भ्रमर-चौदसि-जेठ सुहावनी, धरम हेत जजूं गुन पावनी।।
ॐ ह्ीं ज्येष्ठकृष्ण-चतुर्दश्यां तपोमंगल-मंडिताय श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय
अध्य निर्वपामीति स्वाहा ।3।


शुकल-पौष-द्सै सुखराश है, परम-केवलज्ञान प्रकाश है।
भव-समुद्र-उधारन देव की, हम करें नित मंगल-सेव ही।।
ॐ ह्ीं पौषशुक्ल-दशम्यां केवलज्ञान-मंडिताय श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय अध्य
निर्वपामीति स्वाहा ।4।


असित-चौदशि-जेठ हने अरी, गिरि-समेद-थकी शिव-तिय बरी।
सकल-इन्द्र जजें तित आइ के, हम जजें इत मस्तक नाइ के।।
ॐ हीं ज्येष्ठकृष्ण-चतुर्दश्यां मोक्षमंगल-मंडिताय श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय
अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा 15।


जयमाला


शांति शांतिगुन-मंडिते सदा, जाहि ध्यावत सुपंडिते सदा।
में तिन्हें भगति मंडिते सदा, पूजिहूँ कलुष हंडिते सदा ।।
मोच्छ-हेत तुम ही दयाल हो, हे जिनेश गुन-रत्नमाल हो।
मैं अबै सुगुन-दाम ही धरू, ध्यावते तुरत मुक्ति-तिय वरू ।।


जय शांतिनाथ चिद्रूप-राज, भवसागर में अद्भुत-जहाज।
तुम तजि सरवारथ-सिद्ध थान, सरवारथ-जुत गजपुर महान्।1।


तित जनम लियो आनंद-धार, हरि ततछिन आयो राजद्वार।
इन्द्रानी जाय प्रसूति-थान, तुम को कर में ले हरष-मान ।2।
हरि-गोद देय सो मोदधार, सिर चमर अमर ढारत अपार।
गिरिराज जाय तित शिला-पांडु, ता पे थाप्यो अभिषेक माँडु।3।


तित पंचम-उदधि-तनो सु वार, सुर कर-कर करि ल्याये उदार।
तब इन्द्र सहस-कर करि अनंद, तुम सिर धारा ढारी सुमंद ।4।
अघ घघ घघ धुनि होत घोर, भभ भभ भभ धथ धथ कलश शोर।
दूम दम दृम दूम बाजत मृदंग, झन नन नन नन नन नूपुरंग।5।
तन नन नन नन नन तनन तान, घन नन नन घंटा करत ध्वान।
ता-थेड़ थेड़ थेड़ थेड़ थेड़ सुचाल, जुत नाचत गावत तुमहिं भाल ।6।


चट चट चट अटपट नटत नाट, झट झट झट हट नट थट विराट।
इमि नाचत राचत भगति रंग, सुर लेत जहाँ आनंद-संग।7।


इत्यादि अतुल-मंगल सुठाठ, तित बन्यो जहाँ सुर-गिरि विराट।
पुनि करि नियोग पितु-सदन आय, हरि सौंप्यो तुम तित वृद्धि थाय ।8।
पुनि राजमोर्हि लहि चक्ररत्न, भोग्यो छह-खंड करि धरम-जत्न।
पुनि तप धरि केवल-रिद्धि पाय, भवि-जीवनि को शिवमग बताय ।9।
शिवपुर पहुँचे तुम है जिनेश, गुण-मंडित अतुल अनंत-भेष।
मैं ध्यावत हूँ नित शीश-नाय, हमरी भव-बाधा हर जिनाय 110।
सेवक अपनो निज जान-जान, करुणा करि भौ-भय भान-भान।
यह विधन-मूल-तरु खंड-खंड, चितचिंतित आनंद मंड-मंड 111।
श्री शांति महंता, शिवतिय-कंता, सुगुन-अनंता भगवंता।
भव-भ्रमन हनता, सौख्य अनंता, दातार तारनवंता।।
ॐ हीं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय जयमाला-पूर्णाध्य निर्वपामीति स्वाहा।
शांतिनाथ-जिन के पद-पंकज, जो भवि पूर्जे मन-वच-काय।
जनम-जनम के पातक ता के, तत-छिन तजि के जांय पलाय।।
मनवाछित सुख पावे सो नर, बाँचे भगति-भाव अति लाय।ता तें
 'वृन्दावन' नित वंदे, जा तें शिवपुर-राज कराय।।



हरि-गोद देय सो मोदधार, सिर चमर अमर ढारत अपार।
गिरिराज जाय तित शिला-पांडु, ता पे थाप्यो अभिषेक माँडु।3।
तित पंचम-उदधि-तनो सु वार, सुर कर-कर करि ल्याये उदार।
तब इन्द्र सहस-कर करि अनंद, तुम सिर धारा ढारी सुमंद ।4।
अघ घघ घघ धुनि होत घोर, भभ भभ भभ धध धध कलश शोर।
दम दूम दूम दृम बाजत मृदंग, झन नन नन नन नन नूपुरंग 15।
तन नन नन नन नन तनन तान, घन नन नन घंटा करत ध्वान।
ता-थेड़ थेड़ थेड़ थेड़ थेड़ सुचाल, जुत नाचत गावत तुमहिं भाल ।6।
चट चट चट अटपट नटत नाट, झट झट झट हट नट थट विराट।
इमि नाचत राचत भगति रंग, सुर लेत जहाँ आनंद-संग।7।


19. श्री पार्श्वनाथ जिन पूजा(कवि श्री बख् .. ८
(गीता छन्द)
वर स्वर्ग प्राणत सों विहाय सुमात वामा-सुत भये।
अश्वसेन के पारस जिनेश्वर चरन जिनके सुर नये॥
नव-हाथ-उन्नत तन विराजे उरग-लच्छन अति लसें।
थापूँ तुम्हें जिन आय तिष्ठो! करम मेरे सब नसें॥
ॐ ह्ीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट् (इति
आहवाननम्)
ॐ ह्वीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्र! अत्र तिश्ठ! तिष्ठ! ठ: ठ :! (इति स्थापनम्)
ॐ ह्वीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सच्निहितो भव भव वषट्! (इति
सन्निधिरणम्)


क्षीर-सोम के समान अम्बु-सार लाय के।
हेमपात्र धारि के सु आपको चढ़ाय के।
पार्श्रनाथ देव सेव आपकी करूँ सदा।
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा॥
ॐ हीं श्रीपार्श्वनाधजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति
स्वाहा।।।


चंदनादि केशरादि स्वच्छ गंध लेय के।
आप चर्ण चर्चु मोह-ताप को हनीजिये॥
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करूं सदा।
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा॥
ॐ ह्वीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय भवताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।।


फेन चंद्र के समान अक्षतान् लाय के।
 चर्ण के समीप सार पुंज को रचाय के।
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करूँ सदा।
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा॥
ॐ ह्वीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति
स्वाहा। ॥।

केवड़ा गुलाब और केतकी चुनाय के।
धार चर्ण के समीप काम को नशाय के॥।
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करूँ सदा।
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा॥ॐ ह्ीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय कामबाण-विध्वन्सनाय पुष्पं निर्वपामीति
स्वाहा।।।


घेवरादि बावरादि मिष्ट सर्पि में सने।
आप चरण अर्चते क्षुधादि रोग को हने॥
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करूँ सदा।
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा॥
ॐ ह्ीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति
स्वाह्ा।।


लाय रत्नदीप को सनेह पूर के भरूँ।
वातिका कपूर बारि मोह-ध्यांत को हरूँ।
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करूँ सदा।
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा॥
ॐ हीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति
स्वाहा।।।


धूप गंध लेय के सुअग्नि-संग जारयै।
तास धूप के सुसंग अष्टकर्म बारयै॥
पार्श्रनाथ देव सेव आपकी करू सदा।
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा॥
ॐ ह्ीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्म-दहनाय धूर्प निर्वपामीति स्वाह्ा।।


खारिकादि चिरभटादि रत्न-थाल में भरूँ।
हर्ष धारि के जजूँ सुमोक्ष सौख्य को वरँ।।
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करूँ सदा।
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा॥
ॐ ह्ीं श्री पार्श्रनाथजिनेन्द्राय मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।


नीर गंध अक्षतान् पुष्प चारु लीजियै।
दीप ूप श्रीफलादि अर्ध तें जजीजियै॥
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करूँ सदा।
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा॥
ॐ ही श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय अनर्ध्यपद-प्राप्तये अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा।
पंचकल्याणक-अध्यावली


शुभ प्राणत स्वर्ग विहाये, वामा माता उर आये।
बैशाख तनी दुति कारी, हम पूर्जे विघ्न-निवारी।।
ऊ ह्ीं वैशाख-कृष्ण-द्वितीयायां गर्भकल्याणक-प्राप्ताय
श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा। ॥1।
जनमे त्रिभुवन-सुखदाता, एकादशि पौष विख्याता।
श्यामा-तन अद्भुत राजै, रवि-कोटिक तेज सु लाजै।।
ॐ ह्वीं पौषकृष्ण-एकादश्यां जन्म कल्याणक-प्राप्ताय
श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अध्य निर्वपामीति स्वाहा। 12।


कलि पौष एकादशि आई, तब बारह भावन भाई।
अपने कर लौंच सु कीना, हम पूर्जे चरन जजीना।।
ॐ ह्ीं पौषकृष्ण-एकादश्यां तपकल्याणक-प्राप्ताय श्रीपार्श्रनाथजिनेन्द्राय
अध्य निर्वपामीति स्वाहा। ।3।


कलि चैत चतुर्थी आई, प्रभु केवलज्ञान उपाई।
तब प्रभु उपदेश जु कीना, भवि जीवन को सुख दीना।।
ॐ ह्वीं चैत्राकृष्ण-चतुर्थ्या ज्ञानकल्याणक-प्राप्ताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय
अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा। ।4।


सित-सातें-सावन आई, शिव-नारि वरी जिनराई।
सम्मेदाचल हरि माना, हम पूजें मोक्ष-कल्याना॥
ॐ हीं श्रावणशुक्ल-सप्तम्यां मोक्षकल्याणक-प्राप्ताय
श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अ्ध्य निर्वपामीति स्वाहा। ।5।

जयमाला

पारसनाथ जिनेंद्र तने वच, पौन भखी जरते सुन पाये।
कर्यों सरधान लह्ो पद आन, भये पद्मावति-शेष कहाये॥
नाम-प्रताप टरें संताप, सुभव्यन को शिवशर्म दिखाये।
हो विश्वसेन के नंद भले! गुण गावत हैं तुमरे हर्षाये॥

(दोहा)
केकी-कंठ समान छवि, वपु उतंग नव-हाथ।
लक्षण उरग निहार पग, वंटूँ पारसनाथ।।1।। 


रची नगरी छह मास अगार, बने चहुँ गोपुर शोभ अपार।
सु कोट-तनी रचना छवि देत, कंगूरन पे लहकें बहु केन।2।।
बनारस की रचना जु अपार, करी बहु भाँति धनेश तैयार।
तहाँ विश्वसेन नरेन्द्र उदार, करे सुख वाम सु दे पटनार।।3।।

तज्यो तुम प्राणत नाम विमान, भये तिनके वर नंदन आन।
तबे सुर-इंद्र नियोगनि आय, गिरीन्द्र करी विधि न्हौन सु जाय ॥4।।
पिता-घर सौंपि गये निजधाम, कुबेर करे वसु जाम जु काम।
बढ़े जिन दोज-मयंक समान, रमे बहु बालक निर्जर आन।5।।
भए जब अष्टम वर्ष कुमार, धरे अणुव्रत्त महा सुखकार।
पिता जब आन करी अरदास, करो तुम ब्याह वरो मम आस॥6।।


करी तब नाहिं, रहे जगचंद, किये तुम काम कधाय जुमंद।
चढ़े गजराज कुमारन संग, सु देखत गंग-तनी सुतरंग।।7।।
लख्यो इक रंक करे तप घोर, चहूँ दिसि अग्नि बलै अति जोर।
कहे जिननाथ अरे सुन भ्रात, करे बहु जीवन की मत घात।8।।
भयो तब कोप कहै कित जीव, जले तब नाग दिखाय सजीव।
लख्यो यह कारण भावन भाय, नये दिव-ब्रह्म ऋषि सुर आय॥9।।
तबहिं सुर चार प्रकार नियोग, धरी शिविका निजकंथ मनोग।
कियो वनमाँहि निवास जिनंद, धरे व्रत चारित आनंदकंद |10।।


गहे तहँ अष्टम के उपवास, गये धनदत्त तने जु अवास।
दियो पयदान महा सुखकार, भई पनवृष्टि तहाँ तिहिं बार।11।।
गये तब कानन मौहिं दयाल, धर्यों तुम योग सबहिं अघटाल।
तबै वह थूम सुकेतु अयान, भयो कमठाचर को सुर आन ।12।।
करे नभ गौन लखे तुम धीर, जु पूरब बैर विचार गहीर।
कियो उपसर्ग भयानक घोर, चली बहु तीक्षण पदन झकोर|13।।
रह्यो दशहूँ दिश में तम छाय, लगी बहु अग्नि लखी नहिं जाय।
डे जल मूसल
सु रुंडन के बिन मुण्ड दिखाय, पड़ जलमूसल धार अथाय I।14।।


लख्यो यह कारण भावन भाय, नये दिव-ब्रह्म ऋषि सुर आय॥9।।
तबहिं सुर चार प्रकार नियोग, धरी शिविका निजकंध मनोग।
कियो वनमाँहि निवास जिनंद, धरे व्रत चारित आनंदकंद|10।।


गहे तहँ अष्टम के उपवास, गये धनदत्त तने जु अवास।
दियो पयदान महा सुखकार, भई पनवृष्टि तहाँ तिहि बार।।11।।


गये तब कानन मौहिं दयाल, धर्यों तुम योग सबहिं अघटाल।
तबै वह थूम सुकेतु अयान, भयो कमठाचर को सुर आन |12।।
करे नभ गौन लखे तुम धीर, जु पूरब बैर विचार गहीर।
कियो उपसर्ग भयानक घोर, चली बहु तीक्षण पवन झकोर|13।।
रह्यो दशहूँ दिश में तम छाय, लगी बहु अग्नि लखी नहिं जाय।
सु रंडन के बिन मुण्ड दिखाय, पड़े जल मूसल धार अथाय ||14।।
तबै पद्मावति-कंत धनिंद, नये जुग आय जहाँ जिनचंद।
भग्यो तब रंक सु देखत हाल, लह्यो तब केवलज्ञान विशाल|15|।
दियो उपदेश महाहितकार, सुभव्यनि बोधि सम्मेद पधार।
'सुवर्णभद्र' जहँ कूट प्रसिद्ध, वरी शिवनारि लही वसु-रिद्ध ॥16।।
जजूँ तुव चरन दोउ कर जोर, प्रभू लखिये अब ही मम ओर।
कहे 'बखतावर' 'रत्न' बनाय, जिनेश हमें भव-पार लगाय ॥17।

(घत्ता)

जय पारस देवं, सुरकृत सेवं, वंदत चरण सुनागपती।
करुणा के धारी, पर उपकारी, शिवसुखकारी कर्महती।।
ॐ हीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय जयमाला-पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

(अडिल्ल)

जो पूजे मन लाय भव्य पारस प्रभु नित ही।
ताके दुःख सब जाय भीति व्यापे नहि कित ही।
सुख-संपति अधिकाय पुत्र-मित्रादिक सारे।
अनुक्रमसों शिव लहे, 'रत्न' इमि कहें पुकारे॥
॥इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलि क्षिपेत्।।


 तबै पद्मावति-कंत धनिंद, नये जुग आय जहाँ जिनचंद।
भग्यो तब रंक सु देखत हाल, लह्यो तब केवलज्ञान विशाल |15।।


दियो उपदेश महाहितकार, सुभव्यनि बोधि सम्मेद पधार।
'सुवर्णभद्र' जहँ कूट प्रसिद्ध, वरी शिवनारि लही वसु-रिद्ध ॥16॥
जजूँ तुव चरन दोउ कर जोर, प्रभू लखिये अब ही मम ओर।
कहे 'बखतावर' 'रत्न' बनाय, जिनेश हमें भव-पार लगाय ॥17॥।

(घत्ता)

जय पारस देवं, सुरकृत सेवं, वंदत चरण सुनागपती।
करुणा के धारी, पर उपकारी, शिवसुखकारी कर्महती।
ॐ ह्वीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय जयमाला-पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।


(अडिल्ल)

जो पूजे मन लाय भव्य पारस प्रभु नित ही।
ताके दुःख सब जाय भीति व्यापे नहि कित ही।
सुख-संपति अधिकाय पुत्र-मित्रादिक सारे।
अनुक्रमसों शिव लहे, 'रत्न' इमि कहें पुकारे॥
॥।इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलिं क्षिपेत्।।