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Library > जैन कथा संग्रह
दान की महिमा

एक भिखारी सुबह सुबह भीख मांगने निकला। चलते समय उसने अपनी झोली में
जो के मुट्ठी भर दाने डाल दिए, इस अंधविश्वास के कारण कि भिक्षाटन के लिए
निकलते समय भिखारी अपनी झोली खाली नहीं रखते। येली देखकर दूसरों को भी
लगता है कि इसे पहले से ही किसी ने कुछ दे रखा है।

अनन्तमती की कहानी

 चम्पानगरी में प्रियदत्त सेठ रहते थे। उनकी पुत्री का नाम अनन्तमती था।
वह रूपवती तो थी ही और सेठ जी ने विद्याभ्यास करा कर सोने में सुगन्ध
ही मिला दी थी। अष्टाह्निका के पहले सेठ प्रियदत्त श्री धर्मकीर्ति मुनि के
पास गये और अपनी पुत्री को भी साथ ले गये। वहां उन्होनें मुनिराज के

अन्जन चोर की कहानी -निशंकित ...

जैसा सच्चे देव-शास्त्र-गुरु का स्वरुप यहाँ बताया है वैसा ही है ..
अन्यथा नहीं है .. इस तरीके की सच्चे मार्ग में अटल संशय रहित
रूचि रखने वाले 
के निशंकित अंग होता है।
मिथ्या मार्गियों के बहकाये में न-आकर मंत्र-यन्त्र-टोटके अदि से जो

चार आने का हिसाब

बहुत समय पहले की बात है, चंदनपुर का राजा बड़ा प्रतापी था, दूर-दूर
तक उसकी समृद्धि की चर्चाएं होती थी, उसके
महल में हर एक सुख-सुविधा की वस्तु उपलब्ध थी पर फिर भी अंदर से
उसका मन अशांत रहता था। उसने कई ज्योतिषियों और पंडितों से इसका

अहंकार की मूर्ति

एक मूर्तिकार था जो बहुत अच्छी मूर्तियाँ बनाता था और उसकी मूर्तियाँ
भी बहुत अच्छे दामों पर बिकती थी। समय के साथ उसका बेटा भी बड़ा
हो गया तो उसने वही हुनर अपने बेटे को भी सिखा दिया और दोनों बाप
बेटे मूर्तियाँ बनाने लगे और शाम को बाजार में जाकर उनको बेच आते इस

बासमती चावल

बासमती चावल बेचने वाले एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो
गयी। सेठ को आधी कीमत पर बासमती चावल मिलने लगा।सेठ ने सोचा
कि इतना पाप हो रहा है, तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए।


एक दिन उसने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा
को आमंत्रित कर भोजनप्रसाद लेने के लिए प्रार्थना की।साधु बाबा ने
बासमती चा...

आधा किलो आटा

एक नगर का सठ अपार धन सम्पदा का स्वामी था। एक दिन उस अपनी
सम्पत्ति के मूल्य निर्धारण की इच्छा हुई। उसने तत्काल अपने लेखा
अधिकारी को बुलाया और आदेश दिया कि मेरी सम्पूर्ण सम्पत्ति का मूल्य
निर्धारण कर ब्यौरा दीजिए, पता तो चले मेरे पास कुल कितनी सम्पदा है।


पुण्य का फल

एक गांव मे एक बहुत गरीब सेठ रहता था जो कि किसी जमाने बहुत बड़ा
धनवान था जब सेठ धनी था उस समय सेठ ने बहुत पुण्यं किए गउशाला
बनवाई गरीबों को खाना खिलाया अनाथ आश्रम बनवाए और भी बहुत से
पुण्य किए थे लेकिन जैसे जैसे समय गुजरा सेठ निर्धन हो गया।


रात्रि भोजन त्याग का फल

चम्पापुर नगर में एक सेठ और सेठानी थे। दोनों बहुत ही धर्मात्मा और
दयालु थे। उसी नगर में एक साफ सफाई करने वाले, भीख मांग कर खाने
वाले, मजदूरी करके जैसे तैसे मुशिकल से कमाने वाले गरीब मेतर पति
पत्नी रहते थे। जिनमें आपस में अच्छा प्रेम था दिन भर जो भी मिलता वो

चंद्रप्रभ स्वामी - अष्टम तीर्थंकर की दिव्य जीवन-गाथा

चंद्रप्रभ स्वामी जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर हैं। उनका प्रतीक चिह्न चंद्रमा है,
जो शीतलता और शांति का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने अहिंसा, सत्य
और संयम का उपदेश देकर जीवों को मोक्षमार्ग की ओर प्रेरित किया।
उनकी पूजा से साधक को मानसिक शांति और आत्मिक उत्थान की अनुभूति होती है।