श्री महावीर जी दिगम्बर जैन धर्मावलंबियों की आस्था का प्रमुख केंद्र
(मन्दिर) राजस्थान के श्री महावीर जी नामक स्थान पर स्थित है। यह
मंदिर संपूर्ण भारत में जैन धर्म के पवित्र स्थानों में से एक है। इसको 'टीले
वाले बाबा' के रूप में भी जाना जाता है। गंभीर नदी के तट पर स्थित इस
मंदिर में २४वें तीर्थकर श्री वर्धमान महावीरजी की मूर्ति विराजित है।
आमतौर पर भारत में एक शिखर वाले मंदिर बहुतायत में हैं, लेकिन यहां
स्थित तीन शिखर वाले मंदिर की बात ही कुछ और है। इस मंदिर में देश-
विदेश से जैन थर्मानुयायियों के अलावा पूरे राजस्थान से गुर्जर और मीणा
समुदाय के लोग भी आते हैं। यही वजह है कि हर साल महावीर जयंती के
मौके पर यहां लगने वाले मेले में जैनियों के अलावा दूसरे संप्रदायों के लोग
भी काफ़ी संख्या में आते हैं। इस मेले को राजस्थान पर्यटन विभाग प्रदेश
के महत्त्वपूर्ण आयोजनों में से एक मानता है।


श्री महावीर जी जैन मंदिर से एक प्राचीन कथा जुड़ी हुई है, जो करीब
400 साल पुराना है। माना जाता है कि एक गांव में एक व्यक्ति अपनी
गाय को रोज सुबह घास चरने के लिए अपने घर से खोल देता था, जो
सुबह घास चरने जाती थी और शाम को खुद ही अपने घर वापस लौट
आती थी।


एक बार हुआ कुछ यूं कि गाय का मालिक जब अपने गाय का दूध
निकालने गया,, तो उस गाय की थन से एक बूंद भी दूध नहीं निकला। गाय
के मालिक उस दिन इस बात को नजर अंदाज कर दिया और अगले दिन
भी गाय को घास चरने के लिए खोल दिया।


दूसरे दिन जब उस गाय के मालिक ने शाम को गाय से दूध निकालने गया,
तो उस दिन भी गाय के थन से दूध निकला। गाय के मालिक ने सोंचा की
कोई अन्य व्यक्ति उसकी गाय की दूध चोरी कर लेता होगा, इसलिए अगले
दिन वह व्यक्ति गाय को खुद घास चराने के लिए लेकर जाने का सोंचा।


तीसरे दिन वह आदमी गाय को चरने के लिए खोल दिया और वह आदमी
एक पेड़ के पीछे से छुप कर अपनी गाय को देखने लगा। कुछ देर बाद
जब उस गाय के मालिक ने अपनी गाय को एक टीले के ऊपर अपना दूध
गिराते हुए देखा तो वह आदमी इस बात को गांव वालों से बताया। जब
गांव वालों की मदद से इस टीले की खुदाई की गई, तो उस टीले के अंदर
से पाषाण काल की महावीर जी की एक मूर्ति मिली।


कुछ ही दिनों में यह खबर आसपास के गांव में फैल गई।आसपास के गांव
के लोग भी इस मूर्ति को देखने के लिए यहां आ पहुंचे। कुछ महावीर धर्म
के लोगों ने इस मूर्ति को अपने गांव में साथ ले जाने की सोची। जब वे
लोग मूर्ति को यहां से उठाने लगे, तो बहुत सारे लोगों के कोशिश की
बायजूद भी वह मूर्ति अपने स्थान से तनिक भी हिल न पाया। इस घटना
से प्रभावित होकर बगल के बसवा गांव के निवासी श्री अमरचंद बिलाला
जी ने इस स्थान पर एक अत्यंत विशाल मंदिर का निर्माण करवाया,
जिसमें बहुत बारीकी से कलाकृतियां की गई है।


भगवान के इस अतिशय उद्भव से प्रभावित होकर बसवा निवासी श्री
अमरचंद बिलाला ने यहाँ एक सुंदर मंदिर का निर्माण करवाया। यह मंदिर
प्राचीन और आधुनिक जैन वास्तुकला का अनुपम समागम है, जो प्राचीन
जैन कला शैली के बने मंदिरों से अलग है। यह मंदिर मूल रूप से सफेद
और लाल पत्थरों से बना है, जिसके चारों ओर छत्रियाँ बनी हुई हैं। इस
विशाल मंदिर के गगनचुम्बी धवल शिखर को स्वर्ण कलशों से सजाया गया
है। इन स्वर्ण कलशों पर फहराती जैन धर्म की ध्वजाएँ सम्यक दर्शन, ज्ञान
एवं चरित्र का संदेश दे रही हैं। मंदिर में जैन तीर्थंकरों की कई भव्य मूर्तियाँ
प्रतिष्ठित हैं। इसके साथ ही मंदिर की दीवारों पर स्वर्ण पच्चीकारी का
काम किया गया है, जो मंदिर के स्वरूप को बेहद कलात्मक रूप देता है।
मंदिर के सामने सफेद संगमरमर से भव्य ऊँचा मानस स्तंभ बनाया गया
है, जिसमें श्री महावीरजी की मूर्ति स्थापित की गई है।


श्री महावीर जी में मुख्य मंदिर के अलावा तीन और जिन (जैन) मंदिर हैं।
इनमें मुख्य मंदिर के पास ही स्थित कांच का मंदिर विशेष तौर पर दर्शनीय
है। साथ ही मुख्य मंदिर के नीचे स्थित ध्यान केंद्र में स्थित सैकड़ों रत्न
प्रतिमाएं भी दर्शकों के आकर्षण का केंद्र होती हैं। पास ही स्थित
म्यूजियम में खुदाई में समय-समय पर मिले अभिलेख आदि संग्रह करके
रखे गए हैं। इनसे जैन कला और संस्कृति को क़रीब से जानने का मौका
मिलता है। यहां स्थित पुस्तकालय में जैन संस्कृति से संबंधित प्राचीन ग्रंथ
और पांडडुलिपियां भी मौजूद हैं। अगर थोड़ा वक्त लेकर जाया जाए, तो श्री
महावीर जी से 90 किलोमीटर आगे चमकौर जी जैन मंदिर और रणथंभौर
नैशनल पार्क देखे जा सकते हैं। इसी तरह दिल्ली वापस आते वक्त श्री
महावीर जी से 84 किलोमीटर पहले भरतपुर पक्षी विहार भी देखा जासकता है।